रूपरेखा
परिचय
बड़वानी जिला 25 मई 1998 को अस्तित्व में आया। इससे पहले यह क्षेत्र खरगोन (पश्चिम निमाड़) जिले का हिस्सा हुआ करता था। जिला मध्य प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी कोने में स्थित है, जहाँ पवित्र नर्मदा नदी इसकी उत्तरी सीमा का निर्धारण करती है। प्राकृतिक दृष्टि से यह क्षेत्र विविधतापूर्ण है, जहाँ दक्षिण में सतपुड़ा पर्वतमाला और उत्तर में विंध्याचल की शृंखलाएँ स्थित हैं, जो इसे एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान देती हैं।
इस जिले के नाम की उत्पत्ति ‘बड़ के वन’ से मानी जाती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह स्थान बरगद के विशाल वृक्षों से घिरा हुआ था। ‘वानी’ शब्द का अर्थ ‘बगीचा’ है, इस प्रकार ‘बड़वानी’ का शाब्दिक अर्थ ‘बरगद का बगीचा’ से है। यह नामकरण इस क्षेत्र की हरियाली और प्राकृतिक समृद्धि को दर्शाता है।
इतिहास
बड़वानी का इतिहास वीरता, आध्यात्मिकता और संघर्ष की गाथाओं से भरा पड़ा है। यहाँ का ऐतिहासिक सफर मुख्यतः सिसोदिया राजवंश के इर्द-गिर्द घूमता है, जिनका मूल मेवाड़ (राजस्थान) से जुड़ा हुआ है।
प्राचीन एवं मध्यकालीन स्थापना
बड़वानी रियासत की नींव मेवाड़ के सिसोदिया वंशजों द्वारा रखी गई। ऐसा माना जाता है कि 14वीं शताब्दी के आसपास मेवाड़ के महाराणा के वंशज, राणा जोधा सिंह (अथवा अन्य स्रोतों के अनुसार एक सिसोदिया राजकुमार) इस क्षेत्र में आए। उन्होंने सतपुड़ा की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच ‘अवस्थगढ़’ को अपनी प्रारंभिक राजधानी बनाया। बाद में, सुरक्षा कारणों से राजधानी को वर्तमान बड़वानी शहर में स्थानांतरित कर दिया गया। दिल्ली सल्तनत और मुगल शासन के दौरान भी अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण बड़वानी के शासकों ने अपनी स्वायत्तता कायम रखी।
मराठा काल एवं संघर्ष (18वीं शताब्दी)
18वीं शताब्दी में मालवा पर मराठों का आधिपत्य हो गया। बड़वानी रियासत को भी होलकर और सिंधिया जैसी मराठा शक्तियों के दबाव का सामना करना पड़ा। इस दौरान रियासत को मराठों को चौथ (कर) देना पड़ता था और उसके कई भू-भाग पड़ोसी बड़ी रियासतों में मिल गए।
ब्रिटिश काल (19वीं शताब्दी – 1947)
तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1818) के बाद बड़वानी रियासत ब्रिटिश संरक्षण में आ गई। इसे पहले मध्य भारत एजेंसी की ‘भोपावर उप-एजेंसी’ और बाद में ‘बड़वानी उप-एजेंसी’ के अंतर्गत रखा गया। इस युग में राजा रंजीत सिंह और राजा देवी सिंह जैसे शासकों ने आधुनिक विकास कार्यों को बढ़ावा दिया, जैसे सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों का निर्माण। शहर की सुंदरता के लिए इसे “निमाड़ का पेरिस” कहा जाने लगा। इसी काल में जैन तीर्थ स्थल बावनगजा का जीर्णोद्धार हुआ और यह एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
1857 का स्वतंत्रता संग्राम एवं भीमा नायक
बड़वानी की भूमि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध की गवाह रही है। यहाँ के धाबा बावड़ी में जन्मे भीमा नायक 1857 की क्रांति के एक महानायक थे। उन्होंने एक ‘भील’ सेना गठित की और सतपुड़ा के दुर्गम क्षेत्रों से अंग्रेजों के खिलाफ सफल गुरिल्ला युद्ध लड़ा। गरीबों में अंग्रेजी खजाना लूटकर बाँटने के कारण उन्हें “निमाड़ का रॉबिनहुड” कहा जाता है। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर पोर्ट ब्लेयर (काला पानी) भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।
भारतीय स्वतंत्रता एवं आधुनिक बड़वानी
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के बाद, बड़वानी रियासत के महारावल राजेंद्र सिंह (अंतिम शासक) ने भारत संघ में विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। 1 जून 1948 में यह ‘मध्य भारत’ प्रांत का अंग बना और 1 नवंबर 1956 को मध्य प्रदेश के गठन के बाद इसे पश्चिम निमाड़ (खरगोन) जिले में शामिल कर दिया गया। अंततः 25 मई 1998 को बड़वानी को एक पूर्ण जिले का दर्जा प्राप्त हुआ।
भौगोलिक
जिला बड़वानी 21° 37′ से 22° 22′ उत्तर अक्षांश और 74° 27′ से 75° 30′ पूर्व देशांश के मध्य स्थित है, जिसकी सीमाएँ पूर्व में खरगोन, उत्तर में धार, दक्षिण में महाराष्ट्र और पश्चिम में गुजरात से लगती हैं। यह जिला पश्चिम में एक उच्चतम बिंदु के साथ त्रिभुजाकार आकृति में फैला हुआ है तथा इसका मुख्यालय बड़वानी नगर, पावन नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर अवस्थित है।
जनसंख्या
बड़वानी जिले की जनसंख्या 13,85,881 (जनगणना-2011) दशक में 27.57% की वृद्धि हुई है।